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मुझमें उम्मीद उनसे थोड़ी ज़्यादा है

बैटरी पड़ गयी है मंद, सुस्त हो गयी है घड़ी, वैसे भी अब वक़्त अब देखना  किसको है | ज़िन्दगी की यही रफ़्तार लगने लगी है अच्छी, कौन मुझसे आगे दौड़ेगा देखना मुझको है || दौड़े दौड़े से भागे से आगे फिरते थे मुझसे वो, मेरा मज़ाक बनाने में मज़ा आता था उनको | आज मेरी ज़िन्दगी से रश्क़ करते थमते नहीं, वक़्त की करवट का पहले न पता था उनको || वैसे ग़म और ख़ुशी का भेद भूलते जा रहे हैं वो भी, खुद को सन्यासी बताने में अब गुरेज नहीं | मगर मुझमें उम्मीद उनसे थोड़ी ज़्यादा है , ये पक्का है, बाहर की रौशनी भीतर से तेज नहीं || सजा सबको बराबर मिलेगी, नियति का यही है फ़ैसला, मगर अलग अलग है सबकी सहने की शक्ति  | क़ुसूर किसके ज़्यादा हैं किसके हैं दूसरे से कम, फैसले से फ़रक न पड़े शायद, अब हो गयी विरक्ति ||